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दीवाने कैसे कैसे

बात उन दिनों की है जब सुरैया की शोहरत पूरे देश में फैली थी। उसकी आवाज और अदाकारी का कोई सानी था। पूरे देश में उनके चाहने वाले थे, जो उसे पत्र लिखते थे। सुरैया को लगभग 50 पत्र रोज मिलते थे। सुरैया की एक सहायिका उन पत्रों को पढ़े बिना ही उनके पते पर उन्हें ‘खत के लिए तहे-दिल से शुक्रिया’ लिखते हुए सुरैया का एक सुन्दर सा फोटो भेज देती थी। किसने क्या लिखा उसके बारे में न तो सुरैया को ही पता होता था और न ही उनकी सहायिका को।

उन्हीं दिनों उसके पास किसी नौजवान ने पत्र लिखा कि उनकी फिल्में देख देख कर वह उनका मुरीद हो गया है और उनसे प्रेम करने लगा है। अब वह उनसे शादी करना चाहता है। आगे उसने अपने परिवार के बारे में भी लिख दिया था। पत्र के जवाब में ‘खत के लिए तहे-दिल से  शुक्रिया’ अदा करते हुए सुरैया का एक फोटो मिला।

सुरैया का एक फोटो क्या मिला, वह तो और उत्साहित हुआ, उसे लगा कि सुरैया भी उसे पसन्द करती है तभी तो उसने अपनी फोटो भेजी है। बस क्या था, अगला खत उसने बाकायदा रजिस्टर्ड डाक से भेजा।  पत्र में उसने शादी की तारीख बताने का अनुरोध किया था। इस पत्र के उत्तर में भी वही स्टीरियो टाइप जवाब मिला। अगला पत्र उसने अपने एक खास दोस्त के हाथ भिजवाया जो सुरैया की नानी के नाम था। उस पत्र में विवाह की तारीख तय कर दी गई थी और यह भी ताकीद कर दी कि अगर 15 दिन के अन्दर पत्र का उत्तर नहीं मिला तो इसे ‘हां’ मानते हुए उस तारीख को बारात लेकर आएंगे। साथ ही, उसने वही पत्र रजिस्टर्ड डाक से भी भेजा। मगर उस पत्र का भी कोई जवाब नहीं आया।

एक दिन शाम के वक्त सुरैया अपने घर की पहली मंजिल पर बनी बाल्कनी में खड़ी बाहर का नजारा देख रही थी कि देखा सामने से एक बारात आ रही है। आम लोगों की तरह वह भी देखने लगी तभी किसी ने आकर बताया कि सुरैया की बारात आ रही है। बाराती हाथों में तख्तियां लिए हुए है जुल्फी वेड्स सुरैया

सच में ही बारात उसके घर के सामने आ पहुंची। गैस के हंडो की रोशनी में बैंड-बाजे की धुनों पर थिरकते लड़कों से कालोनी के लोगों ने पूछा तो पता चला कि दूल्हा भैया शादी करने आए हैं। दूल्हा बने लड़के ने बिफरते हुए कहा कि उसने कितने पत्र भेजे थे, मगर एक का भी उत्तर नहीं दिया गया। इसका अर्थ है कि सुरैया भी शादी के लिए रजामन्द है। आखिरकार पुलिस बुलाई गई। पुलिस वालों और मोहल्ले के बड़े बुजुर्गों ने किसी तरह समझाया और बारात को वापस भेजा गया। समय गुजरता गया बाद में सुरैया गुमनामी के अंधेरों में खो गई और वह लडका एक देश के बहुत बड़े प्रतिष्ठित पद पर जा पहुंचा। इस बीच उसने एक बहुत ही सुन्दर लड़की से विवाह कर लिया था।

एक दिन एक पत्रकार ने उसे वह बात याद दिलाई तो उसका उत्तर था, ‘‘अरे भाई वह तो बचपना था, वैसे उसके बाद मैं अपनी पत्नी के साथ सुरैया से मिल चुका हूं और उस दिन की बात याद दिला कर माफी मांग चुका हूं।’’

2.सुरैया का बंगला मेन रोड से थोड़ा हटकर लगभग 300 गज की दूरी पर अन्दर की ओर था। इस बीच में तीन बड़े-बड़े पेड़ थे। एक दिन शाम को सुरैया घर लौटी तो एक युवक उसकी कार के सामने आ गया। कार रोक कर ड्राईवर बाहर निकला तो सुरैया भी साथ निकल आई और गुस्से से उफनते हुए कहने लगीं, मरना है क्या’’? तब तक वह युवक पास आ गया और बोला, ’’मर तो मैं कभी का चुका हूं आप पर, अब तो बस आप चाहें तो मुझे जिन्दा कर सकती हैं’’ सुरैया घबराकर कार में बैठने लगी तो उसने उसके हाथ पकड़ लिए और कहने लगा, ’’आप के बिना अब नहीं रह सकता। आप मुझसे शादी कर लीजिए, मैं आपको पलकों में बिठा कर रखूंगा, मैं आपको बहुत चाहता हूं….., आपको यह भी मंजूर नहीं है तो मुझे अपने घर में नौकर ही रख लीजिए, बस आप………. एक बार…………।’’ सुरैया को गुस्सा आ गया, उसने अपनी चप्पल उतार कर युवक के मुंह पर दे मारी। तब तक ड्राईवर ने भी उसे दो थप्पड़ लगा दिए और उठा कर अलग फेंक दिया। सुरैया अपने घर में चली गई।

अगले दिन देखा कि वह युवक वहीं एक पेड़ के नीचे बैठा था। जैसे ही सुरैया की कार वहां से गुजरी हाथ बांधकर सिर झुका कर खड़ा हो गया। शाम को जब सुरैया घर आई तो उसी तरह सम्मानदायी मुद्रा में खड़ा हो गया। एक दिन, दो दिन, कई दिन बीत गए वह बिना कुछ कहे वहीं बैठा रहता और जब सुरैया निकलती तो हाथ बांध और सिर झुका कर खड़ा हो जाता। सुबह-शाम वही दिनचर्या, एक दिन सुरैया की नानी ने पुलिस वालों से कहकर उसको वहां से उठवा दिया। पुलिस वालों ने दो दिन थाने में बिठाए रखा। पता चला कि उसका कही कोई क्राइम रिकार्ड नहीं था। वह युवक उल्लास नगर का रहने वाला था। वहां बड़े बाजार में उसके पिता की कपड़े की दुकान थी। उन दिनों पुलिस में किसी शरीफ को गुंडा बताकर जेल में डालने की प्रथा नहीं थी। उसके दो भाई और थे जिन्हें बुलाया गया और पुलिस वालों ने समझा बुझा कर उसे पिता और भाईयों के साथ भेज दिया।

मगर दो दिन बाद फिर वह उसी पेड़ के नीचे मौजूद था। उसकी दाढ़ी बढ़ने लगी, बिना नहाए वह गंदा रहने लगा। आस पास के बच्चे बच्चे उसके पास आकर उसे छेड़ने लगे मगर वह किसी को कुछ नहीं कहता उनकी बातें सुन कर हंसता रहता। बच्चे झूठे भी कह देते कि सुरैया आ रही है तो वह झट से खड़ा होकर सिर झुका लेता। लोग उसे भिखारी समझकर रोटी दे जाते। वह एक दो रोटी खाकर बाकी एक कपड़े में बांधकर पेड़ पर टांग देता। दिन में इधर-उधर भटकते हुए सुरैया की फिल्मों के पोस्टरों से सुरैया की तस्वीरे काट लाता और उन्‍हें उसी पेड़ पर लगा देता। सुबह-शाम सुरैया की कार निकलती तो नियम से हाथ बांधकर सिर झुका खड़ा हो जाता। लोग कहते थे कि उसने कभी सुरैया के दरवाजे पर या उसके पास आने की कोशिश नहीं की। तेज धूप, सर्दी और बरसात में भी वह उसी पेड़ के नीचे बैठा दूर से सुरैया के घर की ओर देखता रहता था।

बताया जाता है कि सुरैया के कहने पर ही उसके घर के नौकर उसे खाना देने लगे थे। यह भी सुनने में आया कि खुद सुरैया ने अपनी नौकरानी से कह रखा था कि वह सुबह-शाम उसे खाना पहुंचाने का इंतजाम किया करें। कभी कोई आदमी पुराना कपड़ा दे जाता तो वह उसे पहन लेता और खाने में जो कुछ मिल जाता खा लेता और बची रोटियां एक गठरी में बांधकर पेड़ पर ही लटका देता। करीब एक साल तक यही सिलसिला जारी रहा।

एक बार कई दिन तक जोरो की बारिश होती रही, जब बारिश बंद हुई तो सुबह सुरैया अपनी कार में उधर से निकली वह पेड़ के नीचे ही लेटा था। उस दिन वह उसके सम्मान में खड़ा नहीं हुआ। शाम को वह वहां नहीं था। सुरैया को चाय देते हुए नौकरानी ने बताया कि घर के सामने जो पागल रहता था, सुबह मरा मिला और दोपर में म्यूनिसीपैल्टी वाले उसकी लाश उठा ले गए। बताया जाता था कि यह सुनकर सुरैया बहुत देर तक रोती रही और उस रात उसने खाना भी नहीं खाया।

ऐसी ही एक घटना अभिनेत्री माला सिन्हा के साथ भी हुई। एक बार किसी ‘फैन’ ने उन्हें बनारस से पत्र लिखा जिसमें उनके काम की प्रशंसा करने के साथ-साथ उनकी हरेक फिल्म देखने की बात लिखी थी। बाद में लिखा था कि फिल्मों में उसका काम देखकर वह उससे मुहब्बत करने लगा है और उससे शादी करना चाहता है। साथ ही अपने व्यापार आदि के बारे में पूर्ण रूप से बताते हुए उम्मीद जताई कि वह उसे निराश नहीं करेगी। यह पत्र पढ़कर माला सिन्हा खूब हंसी ओर उसने उस पत्र के उत्तर में धन्यवाद देते हुए लिखवाया कि बाकी सब तो ठीक है परन्तु वह उससे शादी नीं कर सकती क्योंकि वह तो पहले ही शादीशुदा है और उनकी एक छोटी बेबी भी है। उस व्यक्ति ने जो उत्तर दिया उसे पढ़कर माला सिन्हा गुस्से से जल भुन कर रह गई। पत्र में लिखा था, ’’मैं आपसे इतना प्यार करता हूं, मैं आपकी बेटी को भी अपनाने को तैयार हूं, उसे अपनी बेटी समझकर उतना ही प्यार करूंगा। मैं आपके लिए इतना सब करने को तैयार हूं तो क्या आप मेरे लिए अपने पति को तलाक नहीं दे सकतीI

 

परन्तु हेमा मालिनी के साथ कुछ अलग हुआ था। उनकी दो तीन फिल्में ही आईं थी और करीब-करीब सभी हिट रही। उन दिनों रत्नागिरी से किसी ‘फैन’ ने उन्हें पत्र भेजा, जिसमें अच्छी लगने की बात कही और उसने आगे लिखा कि उसने अपने हाथ से उनके लिए एक लहंगा-चोली बनाई है और हेमा एक बार इन कपड़ों को पहनकर दिखा दे। हेमा के सचिव ने लिखा कि आप कपड़े भेजना चाहते हैं तो भेज दीजिए अच्छे रहे तो उनका किसी फिल्म में इस्‍तेमाल कर लेंगे। उस व्यक्ति का उत्तर आया कि कपड़े बहुत महंगे हैं। डाक में खो सकते हैं। उनमें महंगे सलमे-सितारे लगे हैं। इसलिए वह खुद यह कपड़े लेकर आएगा

एक दिन एक आदमी ने आकर बताया कि वह रत्नागिरी से आया है। मगर गेट पर खड़े चैकीदार ने उसे रोक दिया। बहुत शोर शराबा करने पर अन्दर से एक नौकरानी ने कहा कि यह कपड़े दे जाओ। लेकिन वह कपड़े देने को तैयार नहीं हुआ। बस, यही जिद करता रहा कि हेमा मालिनी को बुलाओ। बात बढ़ गई और हेमा के पिता ने नौकरों से कहकर उसे धक्के मारकर घर से निकालवा दिया। उस समय तो वह चला गया। लेकिन उसी रात हेमा की मां जया चक्रवती को कुछ खटपट सुनाई दी तो वह उठीं, देखा पीछे की खिड़की खोलकर एक आदमी अंदर घुस रहा है। वह चोर-चोर चिल्लाई तो उस आदमी ने एक चाकू निकाल कर उनकी गर्दन पर रख दिया और चुपचाप हेमा के कमरे की ओर चलने को कहा। तब तक हेमा और उसके पिता भी आ गए। उस आदमी ने हेमा की ओर एक बंडल बढ़ाया और वह कपड़े पहन कर आने को कहा। तभी हेमा के पिता ने उसके पांव पर डंडा मारा। मगर वह शायद पहले से ही तैयार था, उसने खुद को बचाने के लिए जो चाकू चलाया वह हेमा के पिता की कमर के नीचे लगा। वह व्यक्ति खिड़की से कूद कर भाग गया। पुलिस ने खोजबीन की मगर वह खत, जो उस आदमी ने लिखा था, नहीं मिला जिससे उस आदमी का पता ठिकाना मालूम नहीं सका और मामला खत्म कर दिया गया।

आन्ध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों में अक्सर समुद्री तूफान आते रहते हैं, जिसमें हजारों लोग बेघर हो जाते और जानमाल की काफी क्षति होती है। तूफान पीड़ितों के लिए राहत कार्य चलते चलाए जाते थे। ऐसे में दक्षिण की फिल्म इंडस्ट्री के लोग भी पीछे नहीं रहते थे। वे अलग-अलग शहरों में जुलूस बनाकर लोगों से चन्दा और राहत सामग्री एकत्र करते तथा उसे पीड़ितों में बंटवाते थे। कलाकार प्रायः खुले ट्रकों पर सवार होते थे। लोग उनके हाथों में लिए हुए डिब्बों में पैसे डालते, कोई सिर्फ हाथ जोड़ लेता तो कोई हाथ मिलाता था। 1983 में ऐसे ही एक जुलूस में जयप्रदा भी शामिल थी। एक युवक जयप्रदा के आस आया और उसने डिब्बे में कुछ रूपए डाले और हाथ मिलाने को हाथ आगे बढ़ाया और लपक कर ट्रक पर चढ़ गया। आगे बढ़कर उसने जयप्रदा को गले से लगा लिया, इतना ही नहीं वह उनकी बुरी तरह लिपट गया, वह भी अपने को संभाल नहीं पाई और खुले ट्रक से दोनों नीचे गिर गए। लोगों ने जैसे तैसे खीच खांच कर अलग किया। दोनों को चोंटे लगी। युवक को तो पुलिस ले गई। उस दिन के बाद जयप्रदा अपने प्रशंसकों से काफी दूरी बनाए रखने लगी।

ऐसे ही एक और पुरानी घटना है। इन दिनों राजकपूर की बहुचर्चित और बड़े बजट की एक फिल्म ‘अराउण्ड दी वल्र्ड’ का नई दिल्ली के एक सिनेमा हॉल पर प्रीमियम रखा गया था। इस का खूब प्रचार किया गया और प्रीमियर के समय राजकपूर, प्राण, महमूद तथा निर्माता पंछी आए थे। पहले दिन ’’इनविंग-शो’’ के समय प्रबंधकों के साथ सभी कलाकार गेट पर खड़े होकर हाथ जोड़कर दर्शकों का स्वागत करने लगे। एक-दो लोगों ने आगे बढ़कर उनसे हाथ मिलाया। उन्हें हाथ  मिलाते देखा तो बहुत से लोग हाथ मिलाने आगे बढ़ आए।

अब तो कलाकार पीछे हट गए। बस क्या था हाथ न मिलाने से कुछ लोग गुस्से में आ गए और बाहर आकर पत्थर मारने लगे। पूरे सिने

मा हॉल का हूलिया बिगाड़ दिया। इस प्रकार अचानक पथराव देख पुलिस के जवानों ने भी लाठीचार्ज कर दिया। कलाकारों को तुरन्त अन्दर ले जाया गया और बाद में जैसे तैसे उन्हें भेजा गया। बाहर करीब घंटे भर तक पुलिस और दर्शकों के बीच पत्थरबाजी होती रही। उस दिन के बाद उस सिनेमा हॉल ने कभी भी फिल्म स्टारों को नहीं बुलाया है।

 

**व्यक्तिगत रूप से देखी गई घटनाओं तथा विभिन्न पत्र/पत्रिकाओं के पुराने अंको में प्रकाशित समाचारों के आधार पर यह लेख तैयार किया गया है।

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